जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने ट्विशा शर्मा की मौत के मामले में आरोपी सास और पूर्व जिला न्यायाधीश गिरिबाला सिंह की अग्रिम जमानत रद्द कर दी।
न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा की अवकाशकालीन पीठ ने भोपाल की सत्र अदालत द्वारा 15 मई को जारी जमानत के आदेश को त्रुटिपूर्ण माना। उच्च न्यायालय ने कड़े शब्दों में कहा कि दहेज मृत्यु जैसे संवेदनशील और संगीन मामलों में साक्ष्यों की बारीक पड़ताल बहुत जरूरी होती है, परंतु निचली अदालत ने केस डायरी, गवाहों के बयानों और व्हाट्सऐप चैट जैसे महत्वपूर्ण प्रमाणों को पर्याप्त तवज्जो नहीं दी।
इस बड़े फैसले के बाद अब गिरिबाला सिंह पर गिरफ्तारी की तलवार लटक गई है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) अपनी कार्रवाई को और तेज कर सकती है। उच्च न्यायालय ने अपने 17 पन्नों के विस्तृत आदेश में साफ तौर पर कहा कि भोपाल के 10वें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा दिया गया अग्रिम जमानत का फैसला जमीनी तथ्यों की अनदेखी करके लिया गया था।
न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा ने रेखांकित किया कि इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 80(2), 85, 3(5) और दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 एवं 4 के अंतर्गत बेहद गंभीर अपराध दिखाई देते हैं। ऐसे मामलों में किसी को भी अग्रिम राहत देने से पहले तमाम दस्तावेजों और सुबूतों का गहराई से परीक्षण करना अनिवार्य था, जिसे निचली अदालत ने नजरअंदाज कर दिया। अदालत ने माना कि केस डायरी और डिजिटल साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया गया।
जमानत के बाद का आचरण आपत्तिजनक
उच्च न्यायालय ने इस बिंदु पर भी गहरी नाराजगी जताई कि अग्रिम जमानत का लाभ मिलते ही गिरिबाला सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर मृतका के चरित्र और छवि को धूमिल करने का प्रयास किया। इसके अतिरिक्त, जांच अधिकारियों की तरफ से यह बात भी सामने आई कि वह जांच कार्य में जरूरी सहयोग नहीं कर रही थीं। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी का ऐसा आचरण साफ तौर पर यह दिखाता है कि वह बाहर रहकर जांच की प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश कर सकती हैं।