इंदौर। मध्य प्रदेश के सहकारिता विभाग में पदोन्नति और सेवानिवृत्ति की प्रक्रिया से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें अधिकारी ने पदोन्नति के बाद नए पद पर करीब छह घंटे ही काम किया और उसी दिन सेवानिवृत्त हो गए। बड़वानी में असिस्टेंट रजिस्ट्रार के पद पर कार्यरत सुरेश सांवले को शासन ने पदोन्नत कर ज्वाइंट रजिस्ट्रार बनाया था। उन्होंने 31 अगस्त को सुबह करीब 11 बजे इंदौर पहुंचकर ज्वाइंट रजिस्ट्रार का पदभार संभाला और शाम 5 बजे सेवानिवृत्त हो गए। पदोन्नति के बाद ज्वाइंट रजिस्ट्रार के रूप में उनकी सरकारी सेवा का समय महज करीब छह घंटे रहा। इस अवधि में परिचय और औपचारिक बातचीत के अलावा कोई महत्वपूर्ण न्यायिक कार्य करने का अवसर नहीं मिला। हालांकि, पदोन्नति का लाभ उनकी सेवा संबंधी देयताओं में जुड़ गया। इसका असर सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले पेंशन और ग्रेच्युटी जैसे लाभों पर पड़ना तय माना जा रहा है। इसी वजह से यह मामला विभागीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।
27 जुलाई को आदेश
सुरेश सांवले के मुताबिक शासन ने उनकी पदोन्नति का आदेश 27 जुलाई को जारी किया था। इसके बाद 29 अगस्त को उनकी सेंधवा में मुख्यमंत्री जन अभियान के कार्यक्रम में ड्यूटी लगाई गई थी। उन्होंने वहां ड्यूटी पूरी की और शाम को कार्यमुक्त हुए। इसके बाद 30 अगस्त को बड़वानी से इंदौर आने की तैयारी की और 31 अगस्त को इंदौर पहुंचकर ज्वाइंट रजिस्ट्रार का पदभार ग्रहण किया।
पदभार के कुछ ही घंटे बाद शाम 5 बजे सांवले सेवानिवृत्त
इंदौर में तत्कालीन ज्वाइंट रजिस्ट्रार डॉ मनोज जायसवाल ने उन्हें पद का प्रभार सौंपा। पदभार ग्रहण करने के कुछ ही घंटे बाद शाम 5 बजे सांवले की सेवानिवृत्ति हो गई। सांवले का कहना है कि न्यायिक क्षेत्र में इतने कम समय में कोई आदेश पारित करना संभव नहीं था। ऐसे में नए पद पर उनकी भूमिका मुख्य रूप से पदभार ग्रहण करने और अधिकारियों-कर्मचारियों से परिचय तक सीमित रही।
पुराने आदेशों की अपील से पेंच इस पूरे घटनाक्रम में एक दूसरा पहलू भी चर्चा में है। डॉ. मनोज जायसवाल पहले डिप्टी रजिस्ट्रार (न्यायिक) के पद पर रह चुके हैं। उनके कार्यकाल में पारित किए गए न्यायिक आदेशों के खिलाफ यदि अपील अब ज्वाइंट रजिस्ट्रार (न्यायिक) के समक्ष आती है, तो उसकी सुनवाई को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं। वजह यह है कि संबंधित अधिकारी पहले उन मामलों में आदेश पारित करने वाले पद पर रह चुके हैं। ऐसे मामलों में हितों के टकराव और निष्पक्ष सुनवाई का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है। यही कारण है कि विभाग में इस घटनाक्रम को केवल पदोन्नति और सेवानिवृत्ति के संयोग के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि पदस्थापना और न्यायिक जिम्मेदारियों से जुड़े पहलुओं पर भी चर्चा हो रही है।
पदोन्नति-सेवानिवृत्ति पर बहस
सुरेश सांवले की पदोन्नति के बाद उसी दिन सेवानिवृत्ति ने सहकारिता विभाग में पदोन्नति, पदस्थापना, अतिरिक्त प्रभार और सेवानिवृत्ति की मौजूदा व्यवस्था पर बहस छेड़ दी है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब किसी अधिकारी की सेवानिवृत्ति कुछ ही घंटे बाद होनी हो, तो पदोन्नति और नई पदस्थापना की प्रक्रिया किस तरह तय की जाती है। हालांकि, संबंधित अधिकारी का कहना है कि पदोन्नति शासन के आदेश के अनुसार हुई और उन्होंने निर्धारित प्रक्रिया के तहत नए पद का पदभार ग्रहण किया। लेकिन पदोन्नति के बाद महज छह घंटे की सेवा और उसके साथ जुड़े पेंशन व ग्रेच्युटी लाभ ने इस मामले को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया से अलग चर्चा में ला दिया है।