सर्दियों में चरम पर पहुंचेगा अल नीनो, अगले साल मानसून को लेकर राहत की उम्मीदें!

प्रशांत महासागर की गर्मी का भारत पर असर दिखाई देगा

नई दिल्ली। मौसम विज्ञान के जानकारों की ओर से देश के कृषि और आर्थिक भविष्य के लिए एक बड़ी और राहत देने वाली खबर आई है। विशेषज्ञों का कहना है कि समुद्र के तापमान में होने वाले बड़े बदलाव, जिन्हें अल नीनो कहा जाता है, वे आमतौर पर भारत के मुख्य वर्षा काल से ठीक पहले कमजोर पड़ जाते हैं। इस प्राकृतिक चक्र के कारण आगामी 2027 के वर्षा सत्र पर पड़ने वाले बुरे असर का डर अब काफी हद तक कम हो गया है। यह नई जानकारी ऐसे समय में सामने आई है जब अनुमान जताया जा रहा है कि 2026 के अंतिम महीनों या सर्दियों की शुरुआत तक एक ताकतवर अल नीनो आकार ले सकता है, जो 2027 के शुरुआती महीनों तक सक्रिय रहेगा।

सर्दियों में बढ़ता है प्रकोप, पर वर्षा काल से पहले टूटता है चक्र
मौसम के इस मिजाज को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने वर्ष 1951 के बाद के इतिहास को खंगाला है। पिछले कुछ दशकों में आए सबसे शक्तिशाली समुद्री बदलावों का जब बारीकी से अध्ययन किया गया, तो एक बेहद स्पष्ट और नियमित ढर्रा देखने को मिला। यह देखा गया है कि यह मौसमी प्रणाली अमूमन किसी भी साल के उत्तरार्ध यानी दूसरे हिस्से में धीरे-धीरे मजबूत होना शुरू होती है। इसके बाद यह साल के अंत में या कड़ाके की ठंड के दिनों में अपनी सबसे तीव्र अवस्था में पहुंच जाती है। गनीमत यह रहती है कि जैसे ही भारत में जून से सितंबर के बीच होने वाली मुख्य बारिश का समय नजदीक आता है, यह सिस्टम खुद-ब-खुद दम तोड़ने लगता है। इसी वजह से देश में खेती-किसानी को जीवन देने वाले मानसून पर इसका खतरा टल जाता है।

पुराने अनुभवों से वैज्ञानिकों को मिला बड़ा सहारा
मौसम के इस पुराने ढर्रे को समझने के लिए वर्ष 1997-1998 के दौर को देखा जा सकता है, जिसने गर्मी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। उस समय मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर के पानी की ऊपरी सतह के तापमान में भारी अंतर देखा गया था। यह असामान्य गर्मी जून-जुलाई-अगस्त के महीनों में 1.6 डिग्री सेल्सियस दर्ज की गई थी, जो जुलाई-अगस्त-सितंबर आते-आते बढ़कर 1.9 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गई। इसके बाद सितंबर-अक्टूबर-नवंबर के दौर में यह बढ़कर 2.3 डिग्री सेल्सियस हुई और अक्टूबर-नवंबर-दिसंबर में लगभग 2.4 डिग्री सेल्सियस के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई थी। लेकिन जैसे ही 1998 का मध्य आया, यह पूरी प्रणाली पूरी तरह ठंडी पड़ गई और उसने ला नीना यानी ठंडे प्रभाव का रूप ले लिया था।

गर्म होता समुद्र ही निकालता है रास्ता
ठीक ऐसा ही कुछ वर्ष 2015-2016 के दौरान भी महसूस किया गया था। उस समय भी समुद्र के गर्म होने का सिलसिला जून-जुलाई-अगस्त में 1.6 डिग्री सेल्सियस से शुरू हुआ था, जो जुलाई-अगस्त-सितंबर में 1.9 डिग्री सेल्सियस तक जा पहुंचा। साल के खत्म होते-होते यह गर्मी 2 डिग्री सेल्सियस के पार निकल गई और सर्दियों में अपने सबसे ऊंचे पायदान पर थी। लेकिन, राहत की बात यह रही कि जब 2016 में भारत में बादलों के बरसने का समय आया, तब तक यह तपिश पूरी तरह बेअसर हो चुकी थी। इतिहास के इन्हीं उदाहरणों को देखते हुए इस बार भी देश के मानसून को लेकर चिंताएं बेहद कम हो गई हैं।

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