पैकेज्ड फूड पर वॉर्निंग लेबल को लेकर सुप्रीम कोर्ट की केंद्र और एफएसएसएआई को सख्त चेतावनी!

नई दिल्ली। पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स के लेबलिंग से जुड़े मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने पैकेज्ड फूड पर अतिरिक्त चीनी, नमक और फैट की चेतावनी देने वाले वॉर्निंग लेबल लगाने के मामले में केंद्र सरकार और फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) को आखिरी मोहलत दी है। शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि नमकीन, बिस्किट और चिप्स जैसे खाद्य पदार्थों पर चेतावनी लेबल लगाने को लेकर अगर सरकार खुद कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाती है, तो अदालत इस संबंध में जरूरी निर्देश जारी कर देगी।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने इस विषय की गंभीरता को रेखांकित करते हुए केंद्र सरकार से सवाल किया कि पहले दिए गए निर्देशों के बावजूद इस प्रक्रिया में ढिलाई क्यों बरती जा रही है। अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या निर्णय लेने में हो रही देरी के पीछे कॉर्पोरेट कंपनियों का कोई प्रभाव है। पीठ ने यह स्पष्ट किया कि न्यायपालिका यह प्रयास जनहित को ध्यान में रखकर कर रही है, और 6 महीने पहले भी इस विषय पर गंभीरता से कदम उठाने के निर्देश दिए गए थे।

सुनवाई की वजह और याचिकाकर्ता के तर्क
यह पूरा मामला एक जनहित याचिका (पीआईएल) के जरिए अदालत के समक्ष आया था। याचिकाकर्ता ने पीठ के सामने तर्क रखा कि खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की 7 मार्च को आयोजित बैठक में जो निर्णय लिए गए, वे सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्देशों से मेल नहीं खाते हैं।
याचिका में यह आरोप लगाया गया कि प्राधिकरण द्वारा खाद्य निर्माताओं और कंपनियों के विरोध को प्राथमिकता दी जा रही है। वहीं दूसरी ओर, सिविल सोसाइटी द्वारा स्वास्थ्य सुरक्षा के पक्ष में प्रस्तुत किए गए प्रामाणिक तर्कों और साक्ष्यों की अनदेखी की जा रही है।

बच्चों के स्वास्थ्य और नागरिक हितों पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने इस सुनवाई के दौरान इस बात पर विशेष जोर दिया कि पैकेज्ड फूड में अत्यधिक चीनी, नमक और वसा की मौजूदगी सीधे तौर पर नागरिकों, विशेषकर छोटे बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। अदालत ने दोहराया कि जब बात देश की भावी पीढ़ी के स्वास्थ्य की हो, तो किसी भी व्यावसायिक संस्था या कॉर्पोरेट दबाव को नीतिगत फैसलों पर हावी होने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

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