पुलिस की गंभीर चूक के कारण सोनम को कोर्ट से जमानत मिली – पुलिस ने कई ऐसी धाराएं दर्ज की, जो अस्तित्व में ही नहीं

    इंदौर। सोनम रघुवंशी को राजा रघुवंशी हत्याकांड में जमानत पुलिस की गंभीर चूक के चलते मिली। गिरफ्तारी के दस्तावेजों में गलत और गैर-मौजूद धाराएं दर्ज थीं। जबकि असली मर्डर चार्ज का उल्लेख ही नहीं था। अदालत ने अपने आदेश में जो टिप्पणियां की, उन्होंने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया। जांच एजेंसियों की कार्यशैली पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए।
   अदालत ने अपने आदेश में सबसे बड़ी बात यह कही कि सोनम रघुवंशी की गिरफ्तारी से जुड़े सभी दस्तावेज गिरफ्तारी मेमो, निरीक्षण मेमो, अधिकारों की सूचना मेमो और केस डायरी इन सभी में जिस कानूनी धारा का उल्लेख किया गया, वह अस्तित्व में ही नहीं है। पुलिस के दस्तावेजों में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 403(1) लिखी गई थी। लेकिन, अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसी कोई धारा मौजूद ही नहीं है।
    अदालत ने इसे गंभीर लिपिकीय त्रुटि से भी आगे की बात माना है। जिस हत्या के आरोप में सोनम को गिरफ्तार किया गया, वह बीएनएसएस की धारा 103(1) के तहत बताया गया, लेकिन यह धारा भी उन दस्तावेजों में कहीं दर्ज नहीं थी, जो गिरफ्तारी के समय सोनम को दिखाए गए थे। कानून के मुताबिक, किसी भी आरोपी को यह बताया जाना जरूरी होता है, कि उसे किस अपराध और किस धारा के तहत गिरफ्तार किया जा रहा है। लेकिन, इस मामले में यही मूल प्रक्रिया पूरी तरह से नजरअंदाज होती दिखी।
पुलिस की गलती गंभीर
   पुलिस ने अदालत में दलील दी कि यह सिर्फ एक लिपिकीय गलती थी। लेकिन, शिलांग की अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत का मानना था कि यह कोई साधारण गलती नहीं है, बल्कि इससे आरोपी के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ है। यदि किसी व्यक्ति को यह ही नहीं बताया गया कि उसे किस आधार पर गिरफ्तार किया जा रहा है, तो वह अपने बचाव का अधिकार कैसे इस्तेमाल करेगा! अदालत ने यहां तक कह दिया कि आरोपी को गिरफ्तारी के प्रभावी और वैध कारण नहीं नहीं बताए गए, इसलिए पूरी गिरफ्तारी प्रक्रिया ही अवैध मानी जाएगी।
गाजीपुर कोर्ट में वकील नहीं
  अदालत ने एक और महत्वपूर्ण बिंदु पर ध्यान दिया. आदेश में कहा गया कि ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि सोनम को गिरफ्तारी के बाद वकील की की सुविधा दी गई थी। जब उसे पहली बार गाजीपुर अदालत में पेश किया गया, तब भी यह स्पष्ट नहीं था कि उसे कानूनी सलाह का अवसर मिला या नहीं।

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