दक्षिण भारत में भाजपा की राह आसान नहीं, कांग्रेस ने अपनी ताकत बढ़ाई!

नई दिल्ली। देश के पूर्वी, पश्चिमी और अधिकांश उत्तरी राज्यों में लगातार चुनावी सफलता हासिल कर रही भारतीय जनता पार्टी के सामने दक्षिण भारत की राजनीति फिर चुनौती बनकर उभर रही है। संगठन के विस्तार और चुनावी उपलब्धियों के बावजूद पार्टी को दक्षिणी राज्यों में वह बढ़त नहीं मिल पा रही है, जिसकी उसे लंबे समय से उम्मीद रही है। तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल और तेलंगाना के बदलते राजनीतिक हालात ने पार्टी के लिए नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं।
द्रविड़ राजनीति के गढ़ तमिलनाडु में भाजपा पिछले कई वर्षों से अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने का प्रयास कर रही है। पार्टी को विश्वास था कि के अन्नामलाई के नेतृत्व में उसे राज्य में नई पहचान और जनसमर्थन मिलेगा।
हालांकि, उनके सक्रिय राजनीति में अलग दिशा अपनाने की चर्चाओं ने पार्टी की रणनीति को प्रभावित किया है। अन्नामलाई के बाद बनी नई नेतृत्व टीम विधानसभा चुनावों में अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ सकी। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि यदि अन्नामलाई कोई नया राजनीतिक मंच तैयार करते हैं तो भाजपा के कुछ नेता उनके साथ जा सकते हैं, जिससे संगठन को अतिरिक्त चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

कांग्रेस की नई रणनीति से भाजपा मुश्किल में
कर्नाटक में कांग्रेस की नई राजनीतिक बिसात भाजपा के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाली मानी जा रही है। डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाए जाने को कांग्रेस का सोचा-समझा कदम माना जा रहा है। शिवकुमार को मजबूत संगठनकर्ता और संकट की घड़ी में पार्टी को संभालने वाले नेता के रूप में देखा जाता है। वोक्कालिगा समाज में उनकी मजबूत पकड़ भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) के पारंपरिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। इसके साथ ही कांग्रेस द्वारा लिंगायत समाज को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की संभावनाओं को भाजपा के परंपरागत मतदाता आधार के लिए चुनौती माना जा रहा है। ऐसे में भाजपा को राज्य में अपनी भविष्य की राजनीतिक रणनीति और नेतृत्व संरचना पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है।

केरल और तेलंगाना में भाजपा कमजोर
केरल में भी भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी है। विधानसभा चुनावों में सीमित उपलब्धि के बावजूद पार्टी व्यापक जनाधार तैयार करने में सफल नहीं रही। विशेष रूप से ईसाई मतदाताओं को अपने पक्ष में लाने की कोशिशों का मनचाहा परिणाम नहीं मिला। वहीं तेलंगाना में संगठन के भीतर चल रही खींचतान और गुटीय प्रतिस्पर्धा ने पार्टी की संभावनाओं को प्रभावित किया है। यही कारण है कि भाजपा कई अवसरों पर लोकसभा चुनावों में मिले समर्थन को विधानसभा चुनावों में दोहरा नहीं पाई।

उत्तर भारत में भाजपा ताकतवर
इसके विपरीत उत्तर भारत में भाजपा की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत बनी हुई है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और पंजाब को छोड़ अधिकांश राज्यों में पार्टी प्रभावी स्थिति में मानी जा रही है। आगामी चुनावों को देखते हुए भाजपा को उत्तर भारत से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है। वहीं पंजाब और हिमाचल प्रदेश में संगठन नए राजनीतिक समीकरणों और रणनीतियों के साथ आगे बढ़ने की तैयारी कर रहा है।

भाजपा दक्षिण में इसलिए पिछड़ी
दक्षिण भारत के बदलते राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि वह स्थानीय नेतृत्व, सामाजिक संरचना और क्षेत्रीय मुद्दों के अनुरूप अपनी रणनीति को कितनी प्रभावशीलता के साथ ढाल पाती है। आने वाले वर्षों में यही पहलू दक्षिण भारत में पार्टी की राजनीतिक दिशा तय कर सकते हैं।

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