जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ठगी और जालसाजी से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति के बैंक खाते में कथित तौर पर ठगी की रकम जमा हो जाना, अपने आप में उसकी आपराधिक संलिप्तता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने 78 वर्षीय सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी और पूर्व सैनिक को अग्रिम जमानत दे दी।
जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की अदालत ने कहा कि आरोपी ने अपने बैंक खाते में रकम जमा होने को लेकर स्पष्ट स्पष्टीकरण दिया है। मामले के रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस आधार भी नहीं है, जिससे यह माना जाए कि आरोपी के फरार होने, साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने या गवाहों को प्रभावित करने की आशंका है। यह मामला गोविंदप्पा जयरामैया बनाम मध्य प्रदेश राज्य से संबंधित है।
बीमा राशि दिलाने के नाम पर ₹26.11 लाख की ठगी का आरोप
अभियोजन के अनुसार, 13 जुलाई 2024 को इस मामले में शिकायत दर्ज कराई गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि कुछ लोगों ने भारतीय स्टेट बैंक लाइफ, भारती एक्सा और कोटक लाइफ सहित विभिन्न बीमा संस्थानों का प्रतिनिधि बनकर लोगों को बीमा राशि दिलाने का भरोसा दिया। इसके बाद कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज और गलत जानकारी के सहारे करीब 26.11 लाख रुपये अलग-अलग बैंक खातों और इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से हासिल किए गए।
जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि 6 जुलाई से 26 दिसंबर 2023 के बीच शिकायतकर्ता के खाते से आरोपी के बैंक खाते में कुल 15.15 लाख रुपये भेजे गए थे। पुलिस ने इसी लेनदेन को मामले से जोड़ते हुए आरोपी को प्रकरण में शामिल किया।
अनजान के कहने पर बैंक की जानकारी साझा करने का दावा
हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से बताया गया कि वह वर्ष 2008 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो चुका है। वर्ष 2023 में उसे एक अज्ञात व्यक्ति के संदेश और फोन कॉल आए थे। उस व्यक्ति ने बीमा राशि दिलाने में मदद करने का भरोसा दिया था। आरोपी के अनुसार, उसने इसी भरोसे में अपने बैंक खाते और डेबिट कार्ड से संबंधित जानकारी साझा कर दी थी। उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि उसके खाते का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है। आरोपी को 24 जून 2026 को पुलिस पूछताछ के दौरान पता चला कि इस मामले में उसे आरोपी नंबर 9 बनाया गया है।
बचाव पक्ष ने अदालत में कहा कि आरोपी को न तो उसके खाते में रकम आने की जानकारी थी और न ही बाद में उस रकम की निकासी या इस्तेमाल के बारे में उसे पता था। केवल उसके बैंक खाते के माध्यम से लेनदेन होने के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि वह ठगी या जालसाजी की साजिश में शामिल था।
सरकार ने कहा, आर्थिक अपराध में हिरासत में पूछताछ जरूरी
राज्य सरकार ने अग्रिम जमानत का विरोध किया। अभियोजन की ओर से कहा गया कि ठगी की रकम सीधे आरोपी के बैंक खाते में पहुंची है। मामला आर्थिक अपराध से जुड़ा होने के कारण यह पता लगाने के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ की जरूरत हो सकती है कि उसके खाते का इस्तेमाल किन परिस्थितियों में हुआ और रकम का संचालन किस व्यक्ति ने किया। हालांकि, हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माना कि मामले के प्रमुख आरोप बैंकिंग और इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन से जुड़े हैं। ऐसे मामलों में दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर जांच आगे बढ़ाई जा सकती है।
उम्र और पुराना आपराधिक रिकॉर्ड नहीं होने का भी ध्यान
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल बैंक खाते में कथित ठगी की रकम जमा होने से आरोपी की जानबूझकर अपराध में भागीदारी का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ करना जरूरी है, ऐसा साबित नहीं हुआ है। अदालत ने आरोपी की 78 वर्ष की उम्र, उसके सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी और पूर्व सैनिक होने तथा उसके खिलाफ किसी पुराने आपराधिक मामले का रिकॉर्ड नहीं होने को भी ध्यान में रखा। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने उसे अग्रिम जमानत देना उचित माना।
इस फैसले से अदालत ने यह साफ किया कि किसी बैंक खाते में संदिग्ध रकम का पहुंचना जांच का आधार जरूर हो सकता है, लेकिन केवल इसी तथ्य के आधार पर खाताधारक की जानबूझकर आपराधिक संलिप्तता मान लेना उचित नहीं होगा। आरोपी की भूमिका तय करने के लिए उपलब्ध साक्ष्यों और लेनदेन की परिस्थितियों की जांच जरूरी है।