इंदौर। रक्षाबंधन के पावन पर्व पर आमतौर पर बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रेशम की डोर बांधकर उनसे सुरक्षा का वचन मांगती हैं। मगर शहर में एक ऐसा पुलिस अफसर भी है, जिसकी कलाई पर हर साल एकाध नहीं, बल्कि हजार से डेढ़ हजार महिलाएं और युवतियां राखी बांधने पहुंचती हैं।
शहर के कई थानों की कमान संभाल चुके सतीश पटेल को पूरे इलाके की जनता अफसर नहीं, अपने परिवार के सदस्य और भाई के रूप में देखती है। खाकी और जनता के बीच के इस अनोखे जुड़ाव को उन्होंने ‘पुलिस हमारी मित्र, टीआई हमारा भाई’ अभियान का नाम दिया है। इस आत्मीय रिश्ते का बीज वर्ष 2016 में बोया गया था। उस समय सतीश पटेल सिवनी जिले के छपारा थाने में पदस्थ थे।
त्योहार के दिन ड्यूटी की बाध्यता के कारण उन्हें अपने घर जाने के लिए छुट्टी नहीं मिल सकी। उस दिन एक ऐसी घटना घटी जिसने सतीश पटेल के काम करने के अंदाज को हमेशा के लिए बदल दिया। आसपास के करीब 150 गांवों की महिलाएं अचानक थाने पहुंचने लगीं। वे अपने क्षेत्र के थानेदार को राखी बांधने आई थीं। अचानक उमड़ी भीड़ को देखकर सतीश पटेल खुद गाड़ी लेकर ग्रामीण इलाकों में निकल पड़े, ताकि बहनों को थाने तक आने का कष्ट न उठाना पड़े।
फर्ज भी निभाते हैं अफसर
समय के साथ लोगों में यह विश्वास पक्का होता गया कि यह पुलिस अफसर सिर्फ अपराध रोकने वाला नुमाइंदा नहीं है, बल्कि मुसीबत के वक्त संगे भाई की तरह साथ खड़ा रहने वाला मददगार भी है। वर्ष 2016 के बाद से हर रक्षाबंधन पर यह सिलसिला बढ़ता ही चला गया। अलग-अलग शहरों में अपनी पदस्थापना के दौरान वे अब तक 20,000 से अधिक राखियां बंधवा चुके हैं।
महिलाओं का भरोसा बना ताकत
थानेदार के साथ इस पारिवारिक जुड़ाव का सीधा लाभ पुलिस की व्यवस्था को मिला। महिलाओं को यह भरोसा हो गया कि वे बिना किसी संकोच के अपनी समस्याएं सीधे अपने भाई तक पहुंचा सकती हैं। इसके चलते महिला अपराधों और इलाके की अन्य गतिविधियों की सटीक सूचनाएं सीधे पुलिस मुख्यालय तक पहुंचने लगीं। कई बार तो जागरूक महिलाओं ने असामाजिक तत्वों को खुद पकड़कर पुलिस के हवाले किया। इस तरह राखी के एक धागे ने जन-पुलिसिंग (कम्युनिटी पुलिसिंग) की मजबूत नींव रख दी।