गड़बड़ी की जांच के बीच बैंक की आंतरिक कार्यप्रणाली और नियंत्रण पर उठे गंभीर सवाल
लखनऊ। अयोध्या के भव्य श्री राम मंदिर में आने वाले चढ़ावे की राशि में हेराफेरी और चोरी का मामला अब एक बड़े प्रशासनिक विवाद में बदलता जा रहा है। जैसे-जैसे इस मामले की जांच आगे बढ़ रही है, देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की भूमिका और उसकी कार्यप्रणाली पर गंभीर उंगलियां उठने लगी हैं। जांच में सामने आए नए तथ्यों से यह खुलासा हुआ है कि मंदिर में हर दिन आने वाले करोड़ों रुपये के भारी-भरकम दान की गिनती का काम किसी प्रामाणिक बैंकिंग व्यवस्था के बजाय बिना किसी कानूनी टेंडर प्रक्रिया के सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज नामक एक निजी कंपनी को सौंप दिया गया था।
हैरानी की बात यह है कि यह निजी कंपनी मूल रूप से मैनपावर सप्लाई, साफ-सफाई और सुरक्षा सेवाएं प्रदान करने का काम करती है। ऐसे में एक ऐसी एजेंसी को नोटों की गिनती जैसे बेहद संवेदनशील और गोपनीय काम में लगा दिया गया, जिसके पास इस क्षेत्र का कोई अनुभव नहीं था। इस पूरे मामले पर अब स्टेट बैंक का प्रबंधन पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए है और कुछ भी बोलने से कतरा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इस पूरी व्यवस्था को अमली जामा पहनाने के लिए न तो कोई कॉम्पिटिटिव बिडिंग यानी प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया अपनाई गई और न ही बाजार की दूसरी अनुभवी एजेंसियों से कोई प्रस्ताव मांगे गए। अब यह सवाल सबसे बड़ा हो गया है कि आखिर किस नियम के तहत इस कंपनी को चुना गया और क्या इसके लिए बैंक के उच्च अधिकारियों से जरूरी मंजूरी ली गई थी या नहीं।
कोर बैंकिंग नियमों की अनदेखी, सस्ते कर्मचारियों पर भरोसा
बैंकिंग सेक्टर के जानकारों के अनुसार, किसी भी बैंक के कामकाज को दो मुख्य हिस्सों में बांटा जाता है, जिन्हें कोर बैंकिंग और नॉन-कोर बैंकिंग कहते हैं। कोर बैंकिंग के तहत सीधे पैसे का लेन-देन, कैश डिपॉजिट, विड्रॉल, चेक क्लियरिंग, पासबुक अपडेट और कैश मैनेजमेंट जैसे बेहद महत्वपूर्ण काम आते हैं। इन कामों को सिर्फ और सिर्फ बैंक के स्थायी, प्रमाणित और जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी ही कर सकते हैं। दूसरी तरफ, झाड़ू-पोछा, सुरक्षा और हाउसकीपिंग जैसे सहायक काम नॉन-कोर बैंकिंग में आते हैं, जिन्हें आउटसोर्सिंग एजेंसियों के जरिए कराया जाता है।
परंतु इस मामले में बैंक ने कथित तौर पर अपनी लागत को कम करने के चक्कर में एक बड़ा शॉर्टकट अपनाया। बैंक ने इस आउटसोर्स एजेंसी के माध्यम से मात्र 15 से 20 हजार रुपये के मासिक वेतन पर कुछ अस्थाई कर्मचारियों को काम पर रखा। बाद में इन्हीं कम वेतन वाले कर्मचारियों को राम मंदिर के चढ़ावे की करोड़ों की नकदी गिनने के काम में झोंक दिया गया। बैंकिंग विशेषज्ञों का साफ कहना है कि इतनी बड़ी धनराशि की गिनती हमेशा एक बेहद कड़े, प्रशिक्षित और जवाबदेह सिस्टम के तहत होनी चाहिए क्योंकि इसमें पूरी पारदर्शिता जरूरी होती है। ऐसे संवेदनशील काम पर लगाने से पहले कर्मचारियों के बैकग्राउंड और उनकी सत्यनिष्ठा की पूरी जांच होनी अनिवार्य थी, जिसे नजरअंदाज किया गया।
मानक संचालन प्रक्रिया का उल्लंघन, ऑडिट की नाकामी
विश्वसनीय सूत्रों ने बताया कि नोटों की गिनती के दौरान निर्धारित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर यानी एसओपी का बिल्कुल भी पालन नहीं किया गया। यदि नियमों के अनुसार इस पूरी प्रक्रिया की सख्त निगरानी की जाती, सीसीटीवी कैमरों और वीडियोग्राफी के सामने डबल काउंटिंग यानी दोहरी गणना कराई जाती, तो इस तरह की वित्तीय अनियमितता की नौबत ही नहीं आती। नियमों के मुताबिक इस पूरे काम को केवल अधिकृत बैंक अधिकारियों और मंदिर ट्रस्ट के प्रतिनिधियों की सीधी मौजूदगी में होना चाहिए था, जहां आउटसोर्सिंग के कर्मचारी सिर्फ एक सहायक की भूमिका निभाते, न कि खुद नोट गिनते। यही नहीं, बैंक के भीतर होने वाले त्रैमासिक ऑडिट यानी क्वार्टरली रिव्यू के दौरान भी इस लापरवाही को क्यों नहीं पकड़ा गया, इसे लेकर भी आंतरिक नियंत्रण प्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। कायदे से चढ़ावे की पहली गिनती ट्रस्ट के सामने होनी चाहिए थी, जिसके बाद बैंक अधिकारियों द्वारा इसकी रिकाउंटिंग करके फाइनल वेरिफिकेशन किया जाता और ट्रस्ट को एक आधिकारिक रसीद सौंपी जाती। इस पूरी प्रक्रिया का एक-एक लिखित रिकॉर्ड और डॉक्यूमेंटेशन सुरक्षित रखा जाना चाहिए था, जिसमें हर स्तर पर अधिकारियों और सुरक्षाकर्मियों के हस्ताक्षर होते। इसके साथ ही नोट गिनने वाली मशीनों का भी समय-समय पर कैलिब्रेशन और वेरिफिकेशन होना जरूरी था। अब इस पूरे मामले ने एसबीआई के पूरे मॉनिटरिंग सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है, जिसका सच केवल अंतिम जांच रिपोर्ट आने के बाद ही साफ हो सकेगा।