इंदौर पुलिस ‘पॉकेट गवाहों’ के भरोसे, एक व्यक्ति से कई मुकदमों की गवाही, खजराना के 1246 केस में सिर्फ 2 गवाह!

इंदौर। पुलिस की जांच में गवाहों की भूमिका बेहद अहम होती है। लेकिन, कई थानों में यह व्यवस्था सवालों के घेरे में है। थानों के आसपास रोज नजर आने वाले चाय-पान दुकानदार, गुमटी संचालक और वाहन चालक पुलिस के गवाह बने हुए हैं। एक ही व्यक्ति को बार-बार अलग-अलग प्रकरणों में गवाह बनाए जाने का सिलसिला पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।  खास बात यह है कि गंभीर अपराधों के मामलों में भी ऐसे गवाहों के नाम सामने आ चुके हैं। पॉकेट गवाह बनाने के मामले में डिमोट होकर टीआई से सब-इंस्पेक्टर बने दिनेश वर्मा का मामला सामने आने के बाद अब दूसरे थानों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। खजराना थाने के 1246 मामलों में नवीन और इरशाद नाम के 2 लोगों को गवाह बनाया गया। दोनों थाने के सामने मैजिक चलाते थे। इसी तरह चंदन नगर थाने में सलमान कुरैशी और आमिर उस्मान रंगरेज के नाम भी बड़ी संख्या में मामलों में गवाह के तौर पर सामने आए हैं। दोनों को 165 मामलों में गवाह बनाया गया था। सवाल यही है कि इतने अलग-अलग मामलों की घटनाओं में एक ही लोगों की मौके पर मौजूदगी कैसे रही।

पॉकेट गवाह की पहचान नहीं
पुलिस की भाषा में पॉकेट गवाह ऐसे व्यक्ति को कहा जाता है, जिसे अलग-अलग मामलों में बार-बार गवाह बनाया जाता है। ऐसे गवाह आमतौर पर थाने के आसपास ही दिखाई देते हैं और पुलिसकर्मियों के संपर्क में रहते हैं। चाय-पानी पहुंचाने वाले, थाने के पास गुमटी चलाने वाले और थाने के सामने वाहन चलाने वाले लोगों के नाम इस तरह के मामलों में सामने आते रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल उस समय खड़ा होता है, जब किसी व्यक्ति को ऐसे मामले में भी गवाह बना दिया जाता है, जहां घटना के समय उसकी मौजूदगी का कोई ठोस आधार नहीं होता। जांच अधिकारी गवाहों के बयान के आधार पर केस तैयार करता है और थाना प्रभारी भी चालान पर हस्ताक्षर कर देता है।

2013 में खुली थी इसकी पोल
इंदौर में पॉकेट गवाहों का मुद्दा नया नहीं है। अप्रैल 2013 में मल्हारगंज निवासी सतीश धूत की मौत के बाद पुलिस की इस कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे थे। सतीश पर खुद छेड़छाड़ का मामला दर्ज हुआ था। इसके बाद उसने आत्महत्या कर ली थी। मामले की जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि सतीश कई वर्षों से पुलिस के लिए लगातार गवाह की भूमिका निभा रहा था। वह रोज सुबह कोर्ट पहुंच जाता था और दोपहर करीब 2 बजे तक वहां रहता था। इसके बाद शाम को फिर कोर्ट जाता था। वह एक दिन में 4 से 5 मामलों में गवाही देता था।

गवाह की विश्वसनीयता पर सवाल 
कानून की नजर में गवाह का बयान किसी भी मुकदमे की दिशा बदल सकता है। ऐसे में यदि वह व्यक्ति लगातार अलग-अलग घटनाओं का गवाह बनता रहे, तो उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। पुलिस के सामने चुनौती केवल अपराधी तक पहुंचने की नहीं, बल्कि जांच की निष्पक्षता और गवाहों की वास्तविकता सुनिश्चित करने की भी है। इंदौर में पॉकेट गवाहों से जुड़े पुराने मामलों और वर्तमान में सामने आए आंकड़ों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पुलिस की जांच व्यवस्था अब भी कुछ परिचित चेहरों के सहारे चल रही है। खजराना के 1246 मामलों में 2 गवाह और चंदन नगर के 165 मामलों में 2 गवाहों के आंकड़े इस सवाल को और गंभीर बना देते हैं।

Leave a Comment