Indore के 7 जाँबाज़ों का UPSC में परचम, संघर्ष और जीत की सात अलग कहानियाँ!

किसी ने तीसरे मौके पर मारी बाज़ी, किसी ने मोटी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़ी!

Indore। संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के ताज़ा नतीजों में इंदौर के होनहारों ने अपनी मेहनत का लोहा मनवाया है। शहर के सात युवाओं ने अपनी अलग-अलग पारिवारिक पृष्ठभूमि और संघर्षों के बावजूद इस कठिन परीक्षा को पास कर दिखाया।

अनन्या शर्मा : ऑल इंडिया 13वीं रैंक के साथ शहर का मान बढ़ाया ​संजना पार्क की रहने वाली अनन्या शर्मा ने अपने तीसरे प्रयास में देश भर में 13वां स्थान हासिल किया है। अनन्या की शुरुआती पढ़ाई डेली कॉलेज से हुई और बाद में उन्होंने दिल्ली के हिंदू कॉलेज से अर्थशास्त्र में ग्रेजुएशन किया।

– ​तैयारी का तरीका : वे दिन में 10 से 13 घंटे तक किताबों के साथ बिताती थीं।

– ​पुरानी उपलब्धि : अनन्या इससे पहले ‘सीडीएस’ परीक्षा में देशभर में 5वीं रैंक ला चुकी हैं।

– ​प्रेरणा : उनके पिता स्कूल प्रिंसिपल और माँ कॉलेज प्रोफेसर हैं, जिनसे उन्हें शिक्षा के प्रति लगन विरासत में मिली।

अक्षत बलद्वा : हिंदी मीडियम की बाधा पार कर पहले प्रयास में पाई सफलता (173वीं रैंक) ​

अक्षत की कहानी उन हज़ारों छात्रों के लिए मिसाल है जो भाषा को अपनी कमजोरी मानते हैं। सरकारी स्कूल से हिंदी माध्यम में 12वीं करने वाले अक्षत ने जब नेशनल लॉ स्कूल (बेंगलुरु) में कदम रखा, तो अंग्रेजी के माहौल ने उन्हें काफी परेशान किया।

संघर्ष : शुरुआत में कॉलेज में उनके नंबर कम आए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

– ​दोहरी चुनौती: कॉलेज के आखिरी साल में एक तरफ लॉ की पढ़ाई थी और दूसरी तरफ यूपीएससी का बोझ।

– ​जीत : साल 2025 में ग्रेजुएशन पूरा करते ही उन्होंने पहले ही प्रयास में 173वीं रैंक हासिल कर ली। उन्होंने बताया कि रिज़ल्ट से कुछ दिन पहले वे काफी तनाव में थे, लेकिन अपनी हिम्मत और परिवार के भरोसे ने उन्हें जीत दिलाई।

​दीक्षा चौरसिया : माँ के अधूरे सपने को दी अपनी मेहनत की उड़ान (44वीं रैंक) ​दीक्षा चौरसिया ने 44वीं रैंक लाकर अपनी माँ का बरसों पुराना सपना सच कर दिखाया। उनकी माँ डॉक्टर हैं और खुद कभी अफसर बनना चाहती थीं।

​-सफर का उतार-चढ़ाव : दीक्षा का रास्ता आसान नहीं था।

– ​पहला प्रयास : प्रीलिम्स नहीं निकला।

​दूसरा प्रयास : मेन्स में सिर्फ 12 नंबर से चूक गईं।

– ​तीसरा प्रयास : फिर प्रीलिम्स में असफलता मिली।

– ​चौथा प्रयास : लगातार तीन झटकों के बाद भी दीक्षा अडिग रहीं और चौथे मौके पर टॉप रैंक हासिल की।

​समीक्षा द्विवेदी: सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी छोड़ समाज बदलने की ठानी (56वीं रैंक) ​

समीक्षा द्विवेदी की कहानी उन लोगों के लिए है जो करियर में ‘सेटल’ होने के बाद भी कुछ बड़ा करना चाहते हैं। कंप्यूटर साइंस से बीटेक करने के बाद समीक्षा ने तीन साल सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम किया और एमबीए भी किया।

​-मोड़ : कॉर्पोरेट की दुनिया में ऊँचे पद पर होने के बावजूद उन्हें लगा कि समाज के लिए सीधे तौर पर कुछ करना चाहिए।

– ​धैर्य: साल 2020 में तैयारी शुरू की और चार बार असफल होने के बाद भी पीछे नहीं मुड़ीं। आखिरकार पाँचवें प्रयास में 56वीं रैंक हासिल कर उन्होंने अपना लक्ष्य पा लिया।

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