Ambala के खेड़ा गनी गांव की अनोखी पहल, 30 ग्रेजुएट बहू-बेटियों का नाम नेम प्लेट पर चमका!

अंबाला (हरियाणा)। बदलाव कभी शोर नहीं करता। वह धीरे-धीरे दस्तक देता है और एक दिन समाज की सोच बदल देता है। हरियाणा के Ambala जिले का छोटा-सा गांव खेड़ा गनी इन दिनों ऐसी ही शांत क्रांति का गवाह बन रहा है। यहां घरों की पहचान अब पुरुष मुखिया के नाम से नहीं, बल्कि पढ़ी-लिखी बेटियों और बहुओं के नाम से होती है।

गांव की गलियों से गुजरते हुए सबसे पहले जो चीज ध्यान खींचती है, वह हैं घरों के बाहर लगी चमकती स्टील की नेम प्लेटें। इन पर लिखे हैं बेटियों के नाम और उनकी डिग्रियां एमए, एमबीए, एमएससी, बीएड, बीकॉम। हर प्लेट मानो यह कह रही हो कि यह गांव अपनी बेटियों की शिक्षा पर गर्व करता है।

महिला ग्राम सभा से शुरू हुआ बदलाव

इस पहल की शुरुआत किसी सरकारी आदेश से नहीं, बल्कि नवंबर 2025 में आयोजित महिला ग्राम सभा की बैठक से हुई। बैठक में एचआईआरडी के निदेशक डॉ. वीरेंद्र चौहान मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थे। स्वास्थ्य, कानून, स्वच्छता और महिला अधिकार जैसे विषयों पर चर्चा के दौरान एक विचार उभरा गांव में कितनी बहू-बेटियां उच्च शिक्षित हैं, इसका सर्वे क्यों न किया जाए?

न्यूनतम योग्यता ग्रेजुएशन तय की गई। पंचायत प्रतिनिधियों ने घर-घर जाकर जानकारी जुटाई। जब सर्वे पूरा हुआ तो सामने आई तस्वीर उम्मीद से कहीं अधिक उजली थी—करीब 30 बहू-बेटियां ऐसी थीं, जिन्होंने ग्रेजुएशन या उससे अधिक की पढ़ाई पूरी की थी।

दीवारों पर दर्ज हुई उपलब्धियां

पंचायत ने तय किया कि इन उपलब्धियों को फाइलों तक सीमित नहीं रखा जाएगा। सभी 30 महिलाओं की नेम प्लेट तैयार करवाई गईं और उनके घरों के बाहर लगवाई गईं।

गांव के सोच में बदलाव का संकेत

सरपंच परवीन धीमान के अनुसार, यह सिर्फ सम्मान नहीं, बल्कि सोच में बदलाव का संकेत है। पंचायत सदस्य मनोज कुमार, अनिल कुमार, रूबल देवी, नीतू, पूजा और ग्राम सचिव लोकवीर ने इस पहल को जमीन पर उतारने में अहम भूमिका निभाई। आज गांव की गलियों में चलते हुए हर कुछ कदम पर किसी बेटी की पढ़ाई की कहानी नजर आती है। यह दृश्य गांव के बच्चों के मन में नई आकांक्षाएं जगा रहा है।

सिर्फ सम्मान नहीं, आगे बढ़ने की तैयारी भी

पंचायत ने पढ़ी-लिखी महिलाओं का डेटा भी तैयार किया है, ताकि उन्हें आगे की पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षाओं या अन्य अवसरों में सहयोग दिया जा सके। कुछ युवतियां सिविल सेवा और पोस्ट ग्रेजुएशन की तैयारी में जुटी हैं। यह पहल केवल नाम लिखने तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ने की कोशिश है।

छोटी बच्चियों के सपनों को मिली दिशा

सरपंच परवीन धीमान बताती हैं कि गांव की छोटी बच्चियां, जो अभी पांचवीं कक्षा में हैं, अब पूरे आत्मविश्वास से कहती हैं, वे पढ़ाई बीच में नहीं छोड़ेंगी। उन्हें भी अपने नाम की नेम प्लेट चाहिए। खेड़ा गनी की कच्ची-पक्की गलियों में यह बदलाव साफ दिखाई देता है। यह गांव बताता है कि समाज में परिवर्तन के लिए बड़े मंच या घोषणाओं की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक नेम प्लेट ही काफी होती है, जो पीढ़ियों की सोच बदल दे।

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