‘बार काउंसिल ऑफ इंडिया’ के अध्यक्ष के कार्यकाल पर विवाद, सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सुधारों की मांग

नई दिल्ली। हैदराबाद के एनएएलएसएआर लॉ यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों के विरुद्ध कड़ा कदम उठाने के कारण चर्चा में आए भारतीय बार काउंसिल (बीसीआई) के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा की कानूनी चुनौतियां बढ़ती दिख रही हैं। बीसीआई के संगठनात्मक ढांचे और कामकाज में व्यापक सुधारों की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल की गई है, जिसमें इसके पदाधिकारियों के कार्यकाल को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं।
यह याचिका वकील एम वरधान की ओर से प्रस्तुत की गई है, जिसमें उनका पक्ष अधिवक्ता संदीप पांडे और राजेश चौहान रख रहे हैं। बीसीआई के प्रमुख मनन कुमार मिश्रा भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सदस्य भी हैं। याचिका में एडवोकेट एक्ट की उस व्यवस्था पर सवाल उठाया गया है, जिसके तहत उत्तराधिकारी के चुने जाने तक सदस्य को पद पर बने रहने की छूट मिलती है। याचिकाकर्ता ने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पदों के लिए 2 वर्ष की निश्चित समय सीमा तय करने की मांग की है। इसके अतिरिक्त संस्था में वित्तीय और प्रशासनिक जवाबदेही तय करने तथा क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के लिए चक्रीय व्यवस्था (रोटेशनल सिस्टम) लागू करने का अनुरोध किया गया है।

मनन मिश्रा 12 साल से इस पद पर बने हुए
सर्वोच्च न्यायालय से यह आदेश जारी करने का आग्रह किया गया है कि कोई भी व्यक्ति अपने पूरे जीवनकाल में 3 से अधिक बार अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का पद न संभाले। याचिका में स्पष्ट किया गया है कि किसी भी वैकल्पिक व्यवस्था, नामांकन, समिति या पुन: चुनाव के माध्यम से इस नियम का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए।
प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा नवंबर 2014 से इस पद पर बने हुए हैं। राष्ट्रीय स्तर की नियामक संस्था होने के बावजूद, पिछले 30 वर्षों में 28 में से 20 राज्यों के प्रतिनिधियों को इस शीर्ष पद को संभालने का अवसर नहीं मिला है। याचिका में सभी क्षेत्रों को समान अवसर देने के लिए एक पारदर्शी रोटेशनल प्रक्रिया की मांग की गई है।

दीक्षांत समारोह से जुड़ा विवाद

इस विवाद की पृष्ठभूमि हैदराबाद स्थित एनएएलएसएआर लॉ यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह से जुड़ी है। वहां भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को आमंत्रित किए जाने पर विद्यार्थियों के एक समूह ने विरोध जताया था। छात्र दिल्ली के जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़ी याचिकाओं पर मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी से असंतुष्ट थे। इसके बाद बीसीआई अध्यक्ष ने विरोध करने वाले छात्रों के बार काउंसिल में पंजीकरण पर रोक लगा दी थी, जिसे बाद में वापस ले लिया गया। इस घटनाक्रम के बाद मुख्य न्यायाधीश ने छात्र विरोधी आदेशों के लिए बीसीआई को कड़ी फटकार भी लगाई थी।

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