भोपाल। MP के ग्रामीण इलाकों में मनरेगा (MGNREGA) के तहत पसीना बहाने वाले लाखों श्रमिकों के लिए ‘रोजी-रोटी’ का संकट खड़ा हो गया है। सरकार ने विकास कार्यों के नाम पर तालाबों, सड़कों और खेतों में काम तो करवा लिया। लेकिन, जब भुगतान की बारी आई, तो सरकारी खजाना खाली होने का हवाला दिया जा रहा है। प्रदेश के 36 लाख से अधिक मजदूरों का लगभग 575.81 करोड़ रुपये का पारिश्रमिक बकाया है, जिसके चलते होली जैसे त्योहारों पर भी कई घरों में अंधेरा छाया रहा।

दिल्ली की राह ताकती राज्य सरकार
विधानसभा में हाल ही में पेश किए गए आंकड़ों ने जमीनी हकीकत बयां कर दी है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल ने स्वीकार किया है कि केंद्र से फंड न मिलने के कारण भुगतान में देरी हो रही है और इसकी कोई निश्चित समय-सीमा तय नहीं की जा सकती।
-देनदारी का गणित: केवल मजदूरी ही नहीं, बल्कि निर्माण सामग्री (मटेरियल) का भी 819.04 करोड़ रुपये का भुगतान लंबित है।
– प्रशासनिक पेच: राज्य रोजगार गारंटी परिषद ने पिछले दो वर्षों में चार बार केंद्र को उपयोगिता प्रमाण पत्र (UC) भेजे हैं, लेकिन वहां से अभी तक राशि जारी करने की हरी झंडी नहीं मिली है।
– आर्थिक दबाव: मध्यप्रदेश सरकार पहले ही कर्ज के बोझ तले दबी है, ऐसे में बिना केंद्रीय सहायता के इस भारी-भरकम राशि को चुकाना राज्य के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
कठिन नियमों और पलायन की दोहरी मार
सदन में चर्चा के दौरान यह बात उभरकर आई कि योजना के बदलते नियमों और शर्तों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाई है।
– वित्तीय असंतुलन: केंद्र और राज्य के बीच 60:40 के अनुपात ने प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर अतिरिक्त भार डाल दिया है।
– शहरों की ओर पलायन: मनरेगा का मूल उद्देश्य ग्रामीणों को उनके घर के पास रोजगार देना था, लेकिन भुगतान न मिलने के कारण मजदूर अब फिर से रोजी-रोटी की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन करने को विवश हैं।
– छोटे व्यापारियों की मुसीबत: निर्माण सामग्री की आपूर्ति करने वाले छोटे ठेकेदार और व्यापारी भी भुगतान न होने से आर्थिक तंगी झेल रहे हैं। उनके करोड़ों के बिल फाइलों में धूल फांक रहे हैं।
दावों और हकीकत के बीच पिसता मजदूर
एक ओर सरकार ग्रामीण विकास के लुभावने विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च कर रही है, वहीं दूसरी ओर बुनियादी मजदूरी देने के लिए बजट का रोना रोया जा रहा है। यदि केंद्र और राज्य के बीच यह तालमेल जल्द नहीं सुधरा, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो सकती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कागजी औपचारिकताओं के बीच एक गरीब मजदूर का परिवार इसी तरह अपनी हक की कमाई के लिए तरसता रहेगा?
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