अब स्कूली बच्चों से आस इंदौर। मालवा का यह शहर अपनेपन और मिलनसार स्वभाव के लिए पहचाना जाता है। आपसी तालमेल और मदद करने के मामले में इंदौर का कोई सानी नहीं है। इन दिनों पूरा शहर 3 साल की नन्हीं अनिका की जान बचाने की मुहिम में जुटा है।
अनिका ‘स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी’ (एसएमए) टाइप-2 नाम की एक बेहद गंभीर और दुर्लभ बीमारी से लड़ रही है। उसे बचाने के लिए 9 करोड़ रुपये के इंजेक्शन की दरकार है। आज अनिका की यह स्थिति केवल एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि पूरे समाज की एकजुटता और इंसानियत की अग्निपरीक्षा है।

बेहद दुर्लभ बीमारी से जूझ रही मासूम अनिका के माता-पिता अब तक लोगों के सहयोग से 4.5 करोड़ रुपये जमा कर चुके हैं। अब बाकी रकम के लिए शहर के बच्चों से 100-100 रुपये की मदद की अपील की गई है। तीन साल की अनिका शायद यह नहीं समझती कि उसकी मासूम मुस्कान को बचाने के लिए उसके माता-पिता वक्त और पैसों की कमी से कैसी जंग लड़ रहे हैं।
अनिका अपनी माता-पिता की इकलौती संतान है। क्या है यह बीमारी? स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (एसएमए) टाइप-2 एक ऐसी अनुवांशिक बीमारी है, जो 6 से 18 महीने के बच्चों की मांसपेशियों को कमजोर कर देती है। यह सीधे रीढ़ की हड्डी की नसों पर असर डालती है।
इससे बच्चे बिना सहारे के बैठ तो सकते हैं, लेकिन कभी चल या दौड़ नहीं पाते। इसका एकमात्र समाधान जीन थेरेपी है। चंदे का सहारा इस बीमारी का इलाज मुमकिन तो है, लेकिन इसकी लागत 9 करोड़ रुपये का एक इंजेक्शन है। इसके लगने के बाद अनिका एक सामान्य और तंदुरुस्त जीवन जी सकेगी। पिछले कुछ महीनों से अनिका के माता-पिता चंदा जुटाने (क्राउडफंडिंग) के जरिए इस बड़ी राशि को इकट्ठा करने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने नेताओं, बड़े कारोबारियों, समाजसेवियों और फिल्मी सितारों समेत हर उस शख्स से मदद मांगी है, जिससे उम्मीद की कोई किरण दिख सकती थी। कई हस्तियों ने बढ़ाया हाथ गायिका पलक मुछाल और अभिनेता सोनू सूद जैसे कलाकारों ने अनिका के लिए लोगों से अपील की है।
जब भारतीय क्रिकेट टीम इंदौर आई थी, तब अनिका की मां ने कप्तान रोहित शर्मा से भी मदद की गुहार लगाई थी। इन तमाम कोशिशों के बाद भी अब तक जरूरत की आधी रकम यानी 4.5 करोड़ रुपये ही जुट पाए हैं। अनिका की जिंदगी की जंग अभी आधी बाकी है। वजन बढ़ने का डर इस संघर्ष में सबसे दुखद पहलू अनिका का वजन है।

डॉक्टरों के मुताबिक, यह इंजेक्शन तभी असर करेगा जब बच्ची का वजन 13.5 किलो से कम हो। उम्र के साथ वजन बढ़ना एक सामान्य बात है, लेकिन अनिका के माता-पिता के लिए यही खुशी अब सबसे बड़ा डर बन गई है। वे बस यही प्रार्थना करते हैं कि उनकी बेटी का वजन धीरे बढ़े ताकि उन्हें पैसे जुटाने का थोड़ा और समय मिल जाए। इसी डर की वजह से अनिका को वह आहार नहीं दिया जा रहा जो बढ़ते बच्चों के लिए जरूरी है।
उसे रोटी या चावल के बजाय सिर्फ जूस, दूध और फल दिए जा रहे हैं ताकि उसका वजन काबू में रहे। बच्चे बचाएंगे मासूम की जान फिलहाल अनिका का वजन साढ़े 10 किलो है। डॉक्टरों का मानना है कि आने वाले एक-डेढ़ महीने में यह बढ़कर साढ़े 13 किलो तक पहुंच सकता है।
वक्त हाथ से निकलता जा रहा है। अब आखिरी उम्मीद ‘बच्ची को बचाएंगे बच्चे!’ अभियान से है। एक संस्था (NGO) के साथ मिलकर अनिका के माता-पिता ने इंदौर के स्कूलों से अपील की है कि अगर शहर के साढ़े चार लाख बच्चे सिर्फ 100-100 रुपये का योगदान दें, तो बाकी बचे साढ़े चार करोड़ रुपये आसानी से जमा हो जाएंगे। यह सिर्फ एक छोटी सी मदद नहीं, बल्कि बच्चों द्वारा एक नन्हीं जान को दिया गया नया जीवन होगा।